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ऐसे बच्चों की जरूरत है समाज को Aise bachcho ki jarurat hai samaj ko
ऐसे बच्चों की जरूरत है समाज को Aise bachcho ki jarurat hai samaj ko, Society needs These children. विशेष आवश्यकता वाले बच्चे की पहचान. विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा. विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चे. संसार इस प्रकार के बच्चों की जरूरत समझता है.बच्चों को बिगड़ने के लिए कौन कितना जिम्मेदार है. घर और स्कूल में बच्चो के लिए कैसा माहोल होना चाहिए. एक अध्यापक ने दिया बच्चे को सम्मान. क्या आज के बच्चे रामायण और महाभारत देखते है?
आज मैं अपने स्कूल की पांचवीं कक्षा के बच्चों को एक कविता "यह मेरा हरियाणा" पढ़ा रहा था। कविता के अंत में एक पंक्ति थी - "भीम बली से वीरों वाला, अर्जुन के से तीरों वाला"।
इस पंक्ति की व्याख्या करते हुए मैं अर्जुन की तीरंदाजी के विषय में बताते हुए महाभारत का भीष्म पितामह वाला प्रसंग चल रहा था। मैं बता रहा था कि किस प्रकार अर्जुन ने पितामह को बाणों का तकिया बना कर दिया और बाण से ही पानी की धारा निकाल कर उनकी प्यास बुझाई। मैंने बीच में एक बात बोली कि "इतने बाण लग जाने के बावजूद भी भीष्म पितामह काफी दिन जीवित रहे, उनकी मृत्यु नहीं हुई" तभी एक बालक खड़ा हुआ और बोला - "सर, उनको इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हुआ था" मैं उस 9 साल के लड़के की बात सुनकर हैरान रह गया। क्योंकि जो बात मेरे दिमाग से फिसल चुकी थी, अर्थात जिसका मुझे खुद पता नहीं था, वो बात उस लड़के ने मुझे और पूरी क्लास को बताई।
शायद कोई बच्चा अगर मुझसे पूछता कि वे जीवित क्यों रहे? तो संभवतः मैं ये जवाब देता कि - उनके पास शक्ति थी। "इच्छा मृत्यु" वाली बात मुझे आज एक बच्चे ने बतायी। मैंने उस बच्चे से पूछा कि - बेटा आपने कहाँ से सीखा? बोला - सर टीवी पर आता है महाभारत, उसमें देखा। यही नहीं - उस बच्चे ने सब बच्चों को बताया कि किस समय किस चैनल पर यह सीरियल आता है। मैंने भी सभी बच्चों को प्रेरित किया कि वे टीवी पर इस प्रकार के ज्ञानवर्धक कार्यक्रम अवश्य देखें। वास्तव में यह जरूरी भी है, क्योंकि आज के समाज का जो नैतिक पतन हो रहा है, वह सब पुराने धर्मग्रंथों को न पढने और न जानने के कारण है।
मुझे याद है कि मैं जिस विद्यालय में पढता था, उस विद्यालय में मंगलवार को प्रार्थना के बाद हनुमान चालीसा का पाठ करवाया जाता था। दूसरी कक्षा के बच्चों को हनुमान चालीसा पूरी कंठस्थ होती थी। रामलीला देखने का और रामायण के पात्रों का घर पर अभिनय करना एक शौक भी था, और अच्छी चीजें सीखने का एक मजबूत जरिया था। मैंने 1991 में पांचवीं कक्षा पास की थी। छठी कक्षा में हमारे पाठ्यक्रम में 'रामायण' और सातवीं में 'महाभारत' हिंदी विषय की पूरक पुस्तकें थीं, लेकिन आज नहीं हैं।
कहीं न कहीं किसी कोने में रामायण, महाभारत का एकाध वृत्तांत एक छोटे से पाठ या कहानी या कविता के रूप में मिल भी जाता है तो अध्यापक उसे केवल अभ्यास के प्रश्न उत्तर याद करने और परीक्षा में लिखने या सुलेख लिखने तक सीमित रख देता है। ये सब बातें आज के पतनोन्मुख समाज के हालात के लिए उत्तरदायी हैं। आज के बच्चे को "शीला-मुन्नी" वाले फूहड़ गीत बड़े अच्छे से याद हैं, लेकिन गायत्री मंत्र और राष्ट्रीय गान में बहुत सी गलतियाँ करते हैं। ये दोष बच्चे का नहीं है - इसमें मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि 80% उसके माता-पिता और 10-10 प्रतिशत अध्यापक और सामाजिक परिवेश जिसमें संचार के साधन भी आ जाते हैं, जिम्मेवार हैं।
घर बच्चे की पहली पाठशाला होती है। घर में आप छोटे बच्चे को फूहड़ गीत और अश्लील नृत्य या कोई हिंसक दृश्यों वाली फिल्म टीवी पर दिखाएँगे तो वो उसे पकड़ लेंगे, अगर उन्हें धार्मिक या अध्यात्मिक चैनल लगा कर दे देंगे तो वो उन्हें उसकी आदत पड़ जायेगी। तो फैसला हमारे ही हाथों में होता है कि हमने समय रहते बच्चे को किस दिशा में मोड़ना है। विचार तो बहुत हैं लिखने के लिए, लेकिन फिर कभी आपसे इस विषय में बात होगी।
आज का मेरा लिखने का उद्देश्य केवल उस बच्चे को सम्मान देना था जिसने न सिर्फ मुझे एक नयी बात बतायी, बल्कि अपने सहपाठियों को भी उसने ज्ञानवर्धक चीजें देखने सुनने को प्रेरित किया। ऐसे सभी बच्चों को मैं सलाम करता हूँ, और सभी पाठकों से आशा करता हूँ कि आप भी अपने स्कूल में, अपने घर में ऐसा माहौल तैयार करें कि आने वाली पीढ़ी सदाचार के आदर्शों पर चले और इस समाज में बढ़ रहे अपराधों और बुराइयों को समाप्त कर एक आदर्श समाज की स्थापना हो सके।
"नज़रिया बदलो, नज़ारे बदल जायेंगे। खुद को बदल के तो देखो, तुम्हें देख - सारे बदल जायेंगे॥"
Thanks for reading...
Tags: ऐसे बच्चों की जरूरत है समाज को Aise bachcho ki jarurat hai samaj ko, Society needs These children. विशेष आवश्यकता वाले बच्चे की पहचान. विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा. विशिष्ट आवश्यकता वाले बच्चे. संसार इस प्रकार के बच्चों की जरूरत समझता है.बच्चों को बिगड़ने के लिए कौन कितना जिम्मेदार है. घर और स्कूल में बच्चो के लिए कैसा माहोल होना चाहिए. एक अध्यापक ने दिया बच्चे को सम्मान. क्या आज के बच्चे रामायण और महाभारत देखते है?
"नज़रिया बदलो, नज़ारे बदल जायेंगे। खुद को बदल के तो देखो, तुम्हें देख - सारे बदल जायेंगे॥"
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