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जानिये सन् 1699 की वैशाखी को खाश मानने के कारण - In karno se mante hai 1699 ki vaishakhi ko mahatvpurna
जानिए क्यों खास मानी जाती है सन् 1699 की वैशाखी? क्या कारण है कि सन् 1699 की वैशाखी वैशाखी को खाश माना जाता है? सन् 1699 की वैशाखी को खाश मानने की क्या वजह है? किसलिए सन् 1699 की वैशाखी को ही खाश माना जा रहा है? जानिये सन् 1699 की वैशाखी को खाश मानने के कारण - In karno se mante hai 1699 ki vaishakhi ko mahatvpurna..
वैशाखी का त्योहार मन में हर्ष और उल्लास भर देता है। वैशाखी मनाने के पीछे कई कारण भी है। यह पर्व सालों से मनाया जा रहा है फिर भी सन् 1699 में वैशाखी के दिन जो हुआ उसने भारतीय इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया।
गुरु तेग बहादुर सिंह जी की हत्या के बाद उनके बेटे गुरु गोविंद सिंह दसवें गुरु कहलाए। इन्होंने लोगों में बलिदान देने और संघर्ष की भावना बढ़ाने के लिए 3 मार्च, 1699 को वैशाखी के दिन केशगढ़ साहिब के पास आनंदपुर में एक सभा बुलाई। इस सभा में हजारों लोग इकट्ठा हुए।
गुरु गोविंद सिंह ने यहां पर लोगों के मन में साहस पैदा करने के लिए लोगों से जोश और हिम्मत की बातें कीं। उन्होंने लोगों से कहा कि जो लोग इस कार्य के लिए अपना जीवन बलिदान करने के लिए तैयार हैं, वे ही आगे आएं।
इस सभा में गुरु गोविंद जी अपने हाथ में एक तलवार लेकर आए थे। उनके बार-बार आह्वान करने पर भीड़ में से एक जवान लड़का बाहर आया। गुरु जी उसे अपने साथ तंबू के अंदर ले गए और खून से सनी तलवार लेकर बाहर आए। उन्होंने लोगों से कहा कि जो बलिदान के लिए तैयार है, वह आगे आए। एक लड़का फिर आगे बढ़ा।
गुरु उसे भी अंदर ले गए और खून से सनी तलवार के साथ बाहर आए। उन्होंने ऐसा पांच बार किया। आखिर में वे उन पांचों को लेकर बाहर आए। उन्होंने सफेद पगड़ी और केसरिया रंग के कपड़े पहने हुए थे। यही पांच युवक उस दिन से पंच प्यारे कहलाए।
इन पंच प्यारों को गुरु जी ने अमृत (अमृत यानि पवित्र जल जो सिख धर्म धारण करने के लिए लिया जाता है) चखाया। इसके बाद इसे बाकी सभी लोगों को भी पिलाया गया। इस सभा में मौजूद हर धर्म के अनुयायी ने अमृत चखा और खालसा पंथ का सदस्य बन गया।
Thanks for reading...
Tags: जानिए क्यों खास मानी जाती है सन् 1699 की वैशाखी? क्या कारण है कि सन् 1699 की वैशाखी वैशाखी को खाश माना जाता है? सन् 1699 की वैशाखी को खाश मानने की क्या वजह है? किसलिए सन् 1699 की वैशाखी को ही खाश माना जा रहा है? जानिये सन् 1699 की वैशाखी को खाश मानने के कारण - In karno se mante hai 1699 ki vaishakhi ko mahatvpurna..
वैशाखी का त्योहार मन में हर्ष और उल्लास भर देता है। वैशाखी मनाने के पीछे कई कारण भी है। यह पर्व सालों से मनाया जा रहा है फिर भी सन् 1699 में वैशाखी के दिन जो हुआ उसने भारतीय इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया।

गुरु तेग बहादुर सिंह जी की हत्या के बाद उनके बेटे गुरु गोविंद सिंह दसवें गुरु कहलाए। इन्होंने लोगों में बलिदान देने और संघर्ष की भावना बढ़ाने के लिए 3 मार्च, 1699 को वैशाखी के दिन केशगढ़ साहिब के पास आनंदपुर में एक सभा बुलाई। इस सभा में हजारों लोग इकट्ठा हुए।
गुरु गोविंद सिंह ने यहां पर लोगों के मन में साहस पैदा करने के लिए लोगों से जोश और हिम्मत की बातें कीं। उन्होंने लोगों से कहा कि जो लोग इस कार्य के लिए अपना जीवन बलिदान करने के लिए तैयार हैं, वे ही आगे आएं।
इस सभा में गुरु गोविंद जी अपने हाथ में एक तलवार लेकर आए थे। उनके बार-बार आह्वान करने पर भीड़ में से एक जवान लड़का बाहर आया। गुरु जी उसे अपने साथ तंबू के अंदर ले गए और खून से सनी तलवार लेकर बाहर आए। उन्होंने लोगों से कहा कि जो बलिदान के लिए तैयार है, वह आगे आए। एक लड़का फिर आगे बढ़ा।
गुरु उसे भी अंदर ले गए और खून से सनी तलवार के साथ बाहर आए। उन्होंने ऐसा पांच बार किया। आखिर में वे उन पांचों को लेकर बाहर आए। उन्होंने सफेद पगड़ी और केसरिया रंग के कपड़े पहने हुए थे। यही पांच युवक उस दिन से पंच प्यारे कहलाए।
इन पंच प्यारों को गुरु जी ने अमृत (अमृत यानि पवित्र जल जो सिख धर्म धारण करने के लिए लिया जाता है) चखाया। इसके बाद इसे बाकी सभी लोगों को भी पिलाया गया। इस सभा में मौजूद हर धर्म के अनुयायी ने अमृत चखा और खालसा पंथ का सदस्य बन गया।
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